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महाकुम्भ गीत

तीर्थों में राजा प्रयाग, जहाँ कुम्भ मेला लगे पुण्यों का है भण्डार जहाँ कुम्भ मेला लगे भरद्वाज ऋषि का आश्रम सोहे नागवासुकी, अक्षय वट मोहे मोहे अंजनी कुमार, जहाँ कुम्भ मेला लगे तीर्थों में राजा प्रयाग o..........!  जहाँ पे बहती गंगा जी की धारा यमुना जी का मिलेगा किनारा सरस्वती करें उपकार, जहाँ कुम्भ मेला लगे तीर्थों में राजा प्रयाग o..........!  बारह वर्ष पे महाकुम्भ लगता कल्पवास से संगम तट सजता भीड़ होती है अपरम्पार, जहाँ कुम्भ मेला लगे तीर्थों में राजा प्रयाग o..........!  देशी भी आते विदेशी भी आते शासन प्रशासन भी गोता लगाते देवताओं की होती बहार, जहाँ कुम्भ मेला लगे तीर्थों में राजा प्रयाग o..........! धर्म सनातन भूल मत जाना आना जी आना बच्चे भी लाना करे ज्योति विनती हजार, जहाँ कुम्भ मेला लगे तीर्थों में राजा प्रयाग, जहाँ कुम्भ मेला लगे पुण्यों का है भण्डार जहाँ कुम्भ मेला लगे ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

कुछ कारण है

देखा है जो भी आँखों से, और सुना है मैने कानों से मै व्यक्त करूँ बोलो कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है है जंग बड़ा भीषण खुद से, उसमें अपने प्रतिद्वंदी हैं मै नाम लिखूँ बोलो कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है बादल की तेज भड़क से भी, होता है असर मनुष्यों पर यह पृथ्वी मुह खोले कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है नदियाँ मिलती हैं सागर से, उनका भी वेग बदलता है बोलो सागर बोले कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है सूरज की तेज तपिश से, सारा जग त्राहि त्राहि करता कहो चंद्रमा बोले कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है निर्बल असहाय निरंतर ही, झुकते झुकते गिर जाते हैं अब साथ नही देता कोई, हैं मौन अधर कुछ कारण है है स्वार्थ भरा सबका जीवन, अब नही रहा हमदर्द कोई जख्म दिखाना पागलपन, हैं मौन अधर कुछ कारण है सत्य मार्ग है बड़ा कठिन, इस पर चलना जब मोह न हो लोभ मोह घटता ही नही, हैं मौन अधर कुछ कारण है जब ज्योति जले जग रौशन हो, अन्धकार मिट जाएगा मन का तम मिटता ही नही, हैं मौन अधर कुछ कारण है ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

क्या जीता और क्या हारा

जब निम्न स्तर पर स्वर्ग लगे और शून्य लगे यह जग सारा तब समझो दिल का रोग लगा अब क्या जीता और क्या हारा अब वही दर्द और वही दवा और वही वैद्य बनकर डोले जग कुछ बोले मै कुछ बोलूँ मन कुछ बोले वो कुछ बोले हूँ नही किसी का साथी अब और नही रहा जब बेचारा तब समझो दिल का रोग लगा अब क्या जीता और क्या हारा क्यूँ कभी कभी यह लगता है यह गगन उसी का हिस्सा है मै उसका जीवन किस्सा हूँ वो मेरा जीवन किस्सा है जब उसने अपना दिल सौंपा मै भी जब उस पर दिल वारा तब समझो दिल का रोग लगा अब क्या जीता और क्या हारा ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

तुम होते

 बस यही सोच कर,  दिन गुजर जाता है शाम ढल जाती है कि, तुम होते तो ये उदासी नही होती बस यही सोच कर,  मोड़ छूट जाते हैं राह खत्म हो जाती है कि, तुम होते तो ये खामोशी नही होती बस यही सोच कर,  नींद मिट जाती है रात कट जाती है कि, तुम होते तो ये तन्हाई नही होती बस यही सोच कर,  मन भर आता है आँख भर जाती है कि, तुम होते तो ये जुदाई नही होती

पागलपन

कमरे की हर दीवारें हर कोना यह बोल रहा है कहाँ गई वो परछाई जिसके बिन तू पागल है जिसके पैरों के पायल से घर में छन छन होती थी जिसके हाथों के सिहरन से आँखें दर्पन होती थी कमरे की हर सीढ़ी हर खिड़की यह पूछ रही है कहाँ गई वो अंगड़ाई जिसके बिन तू पागल है जिसका उठना जिसका चलना जिसका हँसना जिसका कहना जिसकी बिन्दी जिसका गजरा जिसकी लाली जिसका कजरा जिसकी नथिया जिसका झुमका जिसका कर्धन जिसका ठुमका जिसकी चूड़ी जिसका कंगन जिसकी मेहँदी जिसका चंदन बस तुझको - बस तुझको ही देखा करते थे तू इक बार जो कह दे तो सौ सौ बार वो मरते थे हर पल पूछ रहे हैं मुझसे बिखरे - बिखरे सन्नाटे कहाँ गई वो अँगनाई जिसके बिन तू पागल है कमरे की हर दीवारें हर कोना यह बोल रहा है कहाँ गई वो परछाई जिसके बिन तू पागल है ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

हृदय दीप

 इस बार दिवाली पर हमको मन का तिमिर मिटाना है जग में दीप जले सो जले हृदयों में दीप जलाना है असहाय वृद्ध घर दीप जले और हृदय प्रेम से वंदन हो भूखे को भोजन, प्यासे को पानी तब ईश्वर अभिनंदन हो जागृत हो दया भाव सब में कुछ ऐसा कर के दिखाना है जग में दीप जले सो जले हृदयों में दीप जलाना है उत्सव होगा नगर - नगर और दीप जलाए जाएंगे चमकेगी हर गली - डगर भगवान बुलाये जाएंगे अवश्य मिलेंगे राम लखन पर शबरी भाव बढ़ाना है जग में दीप जले सो जले हृदयों में दीप जलाना है यदि सक्षम हो बरसात करो दिल से असमर्थ गरीबों पर उनका मन भी हो प्रसन्न खर्चो मत व्यर्थ अमीरों पर यदि सोना बनना है हमको तो पहले स्वयं तपाना है जग में दीप जले सो जले हृदयों में दीप जलाना है मिट जाए ईर्ष्या - द्वेष मिटे टुटे घमण्ड और क्लेश कटे सुखद सरल हो सबका जीवन पाप अंत अरु शेष कटे हे सरस्वती हे महालक्ष्मी हे गणनायक अब आना है जग में दीप जले सो जले हृदयों में दीप जलाना है ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

करवा चौथ

 बना रहे सिंदूर मांग में रहे सलामत साजन चमके बिंदिया खनके चूड़ी पायल गूंजे आंगन टिमटिम करते सारे तारे आना नील गगन में चमक चांदनी शीतल छाया भरना आज बदन में जल्दी आना चन्द्र देवता सफल मनोरथ करना भूख लगे ना प्यास लगे सभी कष्ट खुद हरना दर्शन पा कर धन्य हो जीवन मन हर्षित हो मेरा नित नित शीश झुकाऊं ईश्वर नित हो नया सवेरा नही पले चित द्वेष भावना नही कभी हो क्रंदन जगमग जगमग ज्योति जले है प्रेम भाव से वंदन ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

संघर्ष

संघर्ष सत्य को करना है यह दशमी पर्व बताता है भारत भाग्य विधाता है और धर्म नीति समझाता है यह भी सत्य अवधपति श्री राम जगत के नायक थे पल में रावण वध करते इसमें सक्षम थे लायक थे ऋषियों मुनियों के आश्रम में अनभिज्ञ  बने ज्ञान मिला सरल स्वभाव मृदु वाणी से मान मिला सम्मान मिला नीति धर्म के सम्मुख कुछ उनकी भी जिम्मेदारी थी बस यही विवशता थी उनकी इसीलिए मति मारी थी नंगे पैरों चल - चल कर वन पंचवटी का वरण किए हो न कलंकित यह जीवन सिया अग्नि के शरण किए वन वन भटके ठोकर खाये बृध्दि शबरी से आस लगाए भालू वानर से किये मित्रता असुरों को फिर मार गिराये सत्य धर्म पर अडिग रहे इसलिए समुद्र में सेतु बना पाप अधिक था धरती पर बस उसे मिटाने हेतु बना रोये बिलखे मानव बन कर धीर अधीर हुए सब में सत्य धर्म पर खड़े रहे अमर हुए तब सब नभ में सत्य मार्ग पर चल कर ही मानव ज्योति जलाता है धर्म अधर्म पर भारी है यह राम चरित दर्शाता है संघर्ष सत्य को करना है यह दशमी पर्व बताता है भारत भाग्य विधाता है और धर्म नीति समझाता है ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

जागो जागो

 हद हो गइ अत्याचारों की इनमें हैवान समाया है ये बांग्लादेशी मुस्लिम हैं या मुस्लिम वाली काया है नोच रहे हैं कुत्ते बोटी बहन बेटियां भाग रही हैं छिप रही घरों के कोनों में रातों में भी जाग रही हैं जागो जागो कह कर के घर से बाहर निकल पड़े हैं इसी बहाने सभी दरिंदे हवस मिटाने मचल पड़े हैं चौराहों पर नग्न घुमाया जिसने चाहा उसने खाया शेख हसीना तुम्ही बताओ किसने सारा खेल रचाया है धिक्कार तुम्हारे जीवन पर तुम नर भक्षी मानव हो नही कुरान के ज्ञाता हो तुम दानव हो बस दानव हो जागो जागो कह देने से अब काम नही चलने वाला हाय हाय क्या करते हो दिल इनका नही बदलने वाला ये मुगलों के वंशज हैं अब सम्मुख इनके मत रोना मर्यादा शर्मसार हो जाए डर का बीज भी मत बोना तुम भी राणा के वंशज हो हो वीर शिवा के अनुयायी तन पर अपने भष्म लगाओ प्रगट करो काली माई जगदंब भवानी जाप करो कर में तलवार सम्हलो तुम सत्य सनातन डिगे नही अपना सम्मान बचा लो तुम अब बात शान की आई है परवाह नही अब जान बचे हिंदुत्व हमारा रहे सदा - सत्य - सनातन - सम्मान बचे देखे विश्व जगत तुमको हो संख्य करोड़ लड़ सकते हो जल्लादों का इन मुगलों का मस्तक मरोड़ लड़...

राष्ट्रीय गीत

 लहर लहर लहराए तिरंगा, यह भारत की शान है इसे कभी ना झुकने देंगे, कभी ना इसको झुकने देंगे दिल इसपे कुर्बान है। यह भारत ०.....!!  इस झण्डे पर लिखी क्रांति की स्याही अब तक नही मिटी लूट लिया अँग्रेज ने मिलकर फिर भी कीमत नही घटी इसके लिए हर बार लुटाऊँ जब तक तन में जान है यह भारत की शान है। यह भारत ०....!! हिंदुस्तां की लाज बचे फिर अंतिम क्षण भी वार दिये खड़े रह गए सभी फिरंगी आजाद स्वयं को मार दिये नही झुका जब रण में उतरा झाँसी अश्व महान है।  यह भारत की शान है। यह भारत ०....!! मंगल पांडे असफाक बिस्मिल खुदी राम ना भूलेंगे नेता सुभाष आजाद भगत सिंह बन उपवन में फूलेंगे सरदार तिलक और शास्त्री गाँधी नायक वीर जवान है।  यह भारत की शान है। यह भारत ०....!! ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

ग़जल

मै हर रोज टूटता हूँ , बिखर जाता हूँ उसको याद करता हूँ, संवर जाता हूँ सोचता हूँ कि अब उसको भुला दूँगा कम्बख़्त रहम दिल है, मुकर जाता हूँ यूँ तो ज़ाम पी कर भी नशा नही होता दर्द-ए- ग़म पीता हूँ, उतर जाता हूँ उसी को छोड़ दूँ, या सब को छोड़ दूँ इसी कश्मकस में रोज गुजर जाता हूँ ये उम्र है, जवानी है, या कुछ और है गहराई से देखता हूँ, तो ठहर जाता हूँ कभी कभी जब वो सामने आ जाए मै तालाब हो कर भी लहर जाता हूँ मै परिंदा तो नही जो डाल - डाल बैठूँ ज्योति हूँ, जलता हूँ, तो नज़र आता हूँ ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

राम राम (भजन)

इस भजन में कुल 50 बार राम शब्द का प्रयोग किया गया है। यदि एक बार राम राम बोलने से 108 मनकों की माला फेरने का पुण्य प्राप्त होता है तो इस भजन में कुल 25 बार राम राम बोलने का सौभाग्य प्राप्त होता है। जिसका अर्थ यह है कि, 25×108=2700 इस प्रकार यह भजन दिन में चार बार भजने से 04×2700=10800 मनकों का जाप हो जाता है। जो एक मनुष्य को 10800 बार ईश्वर का स्मरण करने के बराबर है। ( वैज्ञानिक विधि से एक स्वस्थ मनुष्य 24 घण्टे में 21600 बार स्वास लेता है, जिसमें वह 12 घण्टे दिनचर्या में व्यतीत कर देता है। इसलिए 10800 बार जप कर पाना संभव नही है इसलिए दो शून्य हटा कर 108 मनकों का जप करना पवित्र और पुण्य माना गया है। इसलिए इस भजन को चार बार कहने मात्र से 10800 मनकों का जप सरलता से संभव हो जाएगा।  राम राम रटता है राम राम करता है फिर भी न मानता है राम तेरे मन में राम राम कहता है राम राम सुनता है फिर भी न जानता है राम हैं भजन में।।  राम राम धुन प्यारे राम राम सुन प्यारे राम नाम बसा सारे जन के नयन में।।  राम राम द्वेष नही राम राम क्लेश नही राम नाम मिलता है धनी के सयन में।।  राम राम शीतल ज...

स्त्रीयों का द्वेष

(इसमें तीन स्त्रियाँ सही हैं, तो तीन स्त्रियाँ गलत भी हैं) एक औरत ही औरत के दुःख का कारण होती हैं वह खुद ही द्वेष बढ़ाती हैं खुद ही बैठ के रोती हैं जब तक माँ बेटी होती हैं हर कष्ट खुशी से सहती हैं बन गयी बहू तो फिर सातवें आसमान पर रहती हैं दिन रात पहाड़ा पढ़ती हैं और नही चैन से सोती हैं वह खुद ही द्वेष बढ़ाती हैं खुद ही बैठ के रोती हैं एक बहू के आने से सास बन गयी सभी में ख़ास सास कहे बात सुनो कहूँ भला क्या जूना इतिहास अपमानित कर स्त्री को ईर्ष्या के बीज वो बोती हैं वह खुद ही द्वेष बढ़ाती हैं खुद ही बैठ के रोती हैं ननद बनी वह भी स्त्री भाभी बनी जो वह भी स्त्री देवरानी बनी वह भी स्त्री जेठानी बनी वह भी स्त्री बात करें वो बढ़ चढ़ कर आप ही आपा खोती हैं वह खुद ही द्वेष बढ़ाती हैं खुद ही बैठ के रोती हैं इतिहास गवाह है युग युग से एक से दो यदि हो जाएं भगवान ही जाने दिन बीते रात शान्ति से सो जाएं गांधारी द्रौपदी सिया सुपर्णखा सुरुचि सुनीति होती हैं वह खुद ही द्वेष बढ़ाती हैं और खुद ही बैठ के रोती हैं यदि स्त्री स्त्री को समझे परिवार नही फिर बिगड़ेगा स्नेह - प्रेम घर बरसेगा और स्वर्ग धरा पर उतरे...

अयोध्या की व्याकुलता (गीत)

अयोध्या थी बड़ी व्याकुल कहाँ अब राम आयेंगे अयोध्या है बड़ी हर्षित हमारे राम आयेंगे थी सूनी हर गली अपनी था सूना हर महल अपना अयोध्या नाथ बिन तुम्हरे अयोध्या थी महज सपना प्रकाशित हो उठी गलियाँ मेरे भगवान आयेंगे अयोध्या है बड़ी हर्षित हमारे राम आयेंगे दरश पाने की हो इच्छा तो शबरी माँ सी भक्ती हो हृदय में धैर्य हो अपने भले ही तन की मुक्ती हो अंतिम क्षण में आ कर के वो जूठे बेर खायेंगे अयोध्या है बड़ी हर्षित हमारे राम आयेंगे भरोसा था विभीषण को मिलेंगे राम चिंतन से कहाँ मालूम था जग को जितेंगे प्रभु दसानन से रहो चाहे जहाँ जग में सियापति मिल ही जायेंगे अयोध्या है बड़ी हर्षित हमारे राम आयेंगे अयोध्या फिर हुई जगमग प्रतिष्ठा प्राण की होगी लखण, रिपुसूदन, भरत के बाण की होगी हनुमत भक्त यह बोले नदी सरयू नहायेंगे लिख ज्योति यह बोले अयोध्या दर्शन को जायेंगे अयोध्या है बड़ी हर्षित हमारे राम आयेंगे अयोध्या थी बड़ी व्याकुल हमारे राम आयेंगे अयोध्या है बड़ी हर्षित हमारे राम आयेंगे ज्योति प्रकाश राय

दीपावली का अमृत महोत्सव

आओ मिलकर दीप जलायें दीपोत्सव है आया सब मिलकर खुशी मनायें अमृत महोत्सव है छाया जैसे दूर गगन में टिम टिम करते तारे लगते प्यारे वैसे हम सब मिलकर बदलें पृथ्वी के सभी नज़ारे दूर भगाओ दूर भगाओ है जो घन घोर अंधेरा स्वच्छ हुआ है जितना आँगन उतना हो सब डेरा मन का तिमिर मिटाने खातिर दीपोत्सव है आया सब मिलकर खुशी मनायें अमृत महोत्सव है छाया मन का तिमिर मिटाने से जीवन सरल है होता मन में जिसके अंधकार वह जीवन भर है रोता लक्ष्मी - गणेश के पूजन से बुद्धि सबल है होती यदि कृपा न होती मातु भारती सारी दुनिया सोती सुख समृद्धि बढ़ाने खातिर हर मानव है धाया सब मिलकर खुशी मनायें अमृत महोत्सव है आया दीप जलाओ नाचो गाओ अवध सिया पति आयेंगे विजय पताका कीर्तिमान हिंदुत्व का मान बढ़ायेंगे अहंकार बलिदान करो ध्यान करो कुछ कर्मो का दीपावली का पर्व है आया ज्ञान भरो कुछ धर्मो का आओ मिलकर ज्योति जलाएँ छोड़ो जो भी है माया सब मिलकर खुशी मनायें अमृत महोत्सव है छाया ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

दास्ताँ

देखा था जो भी स्वप्न वो स्वप्न छल गए गुजरी जवान उम्र ख्वाहिश भी टल गए सोचा था  वो बनेंगे  सहारा बुढ़ापे का रुपया कमाने घर से बच्चे भी कल गए    (1)  हम दो ही रह गए हैं अपनी हवेली में जीता है जैसे आदमी किस्से पहेली में वो पेड़ गिर रहा जो छाया था दे रहा फल नही तो नाम का साया था दे रहा अहमियत से ज्यादा तुम पर लुटा दिया जीता गया तुम्हे खुद को मिटा दिया मांगा था जो भी तुमने वो सब दिया तुम्हे कर्जे में डूब कर भी खुश कर दिया तुम्हे तकलीफ तब हुई जब तन से बल गए रुपया कमाने घर से बच्चे भी कल गए    (2)  क्या याद है तुम्हे या भूल तुम गए आकर हमारी बाहों में जब झूल तुम गए खुश होकर मैंने तुम्हे कंधा बिठा लिया सिर पर खड़ा किया चंदा दिखा दिया अंगुली पकड़ चले जब थोड़े बड़े हुए बैठा जमीं पे मै हाँ तब तुम खड़े हुए मुस्कान देख कर मेरा दिल मचल गया तुमको हँसाने खातिर मै फिसल गया तड़पे बहुत थे हम शाला को चल गए रुपया कमाने घर से बच्चे भी कल गए    (3)  पेंसिल रबर शियाही काॅपी दिया तुम्हे जिद पे अड़े थे जब टॉफी दिया तुम्हे जब भी दिवाली आई दीपक जलाए हम जो भी कह...

देवी माँ की आरती

 तुम्ही हो दुर्गा तुम्ही हो काळी तुम ही अष्टभुजाओं वाली तुम ही माता भारती,है आरती है आरती, है आरती..........  पड़ा कभी जब कष्ट से पाला तुमने आ कर हमें सम्हाला जब भी तुमको याद किया माँ तुमसे जब फरियाद किया माँ हो कष्ट सभी तुम टाराती, है आरती है आरती, है आरती............ हिंगलाज में तुम्ही हो मइया पालनहार और तुम्ही खेवइया रक्तबीज को तुम्ही संहारा भैरव को तुमने ही उबरा तुम ही सबको सँवारती, है आरती है आरती, है आरती...........  पहली आरती मणिकर्णिका दूसरी आरती विंध्याचल में तिसरी आरती कड़े भवानी चौथी आरती माँ जीवदानी पाँचवी यहाँ पुकारती, है आरती है आरती, है आरती.............. कहे ज्योति हे शैल भवानी अरज सुनो दुर्गा महारानी विपदा सबकी पल में हर लो दया दृष्टि हम पर भी कर लो मेरि आँखें राह निहारती, है आरती है आरती, है आरती..........।। ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

भजन (देवी गीत)

तर्ज - राधे तेरी चरणों की रज धूल जो मिल जाए मइया तेरे मन्दिर में हर पल ही उत्सव है माँ तुझे समर्पित है जीवन जो सम्भव है मइया तेरे मन्दिर में..............। तेरा धाम बसा मइया चहुँ ओर पहाड़ों पर मझधार मेरी नइया तू ला दे किनारे पर तू कर दे कृपा मइया मंगल ही मंगल है मइया तेरे मन्दिर में.............। मेरा और नही कोई बस तेरा सहारा है इसलिए मेरी माता तेरा नाम पुकारा है हे दुर्गा शिवा धात्री तेरे नाम का पूजन है मइया तेरे मन्दिर में.............। है राह बड़ा दुर्गम किस तरह से आऊँ मै हो जाए कृपा तेरी बस तुझे धियाऊँ मै जब बंद करूँ आँखें तेरे रूप का दर्शन है मइया तेरे मन्दिर में...........।  दुर्गा तेरे.... काली तेरे.... शारदे.... त्रिकुटा तेरे....। ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

पुष्प की आकांक्षा

ओ बाग लगाने वाले माली मुझे बचाने वाले माली तुमसे करूँ एक उम्मीद मुझको होता सुखद प्रतीत तुम्ही हो मेरे भाग्य विधाता तुम्ही से मेरा जीवन है तुम्ही से पुष्प सुगंधित हैं तुम्ही से जीवित उपवन है मुझे तोड़ कर हार बनाना वर माला या द्वार बनाना शोभा सदा बढ़ाऊँगा यदि काम तुम्हारे आऊँगा पर मेरी अर्जी अगर सुनोगे जिस दिन उसके लिए चुनोगे उस दिन मैं इतराउंगा गुणगान तुम्हारे गाऊंगा जब निकलेगी वीरों की टोली गूंजेगी जय हिन्द की बोली मैं भी शरहद पर बरसूँगा चहुँ ओर सुगंधित कर दूँगा हिन्द देश के झण्डे संग जब जब लहराया जाता हूँ मैं भारत भूमि को चूम चूम इठलाता हूँ इतराता हूँ बस एक निवेदन है माली उपयोग करो सैनिक पथ पर यह ज्योति प्रज्वलित रहे सदा अपने नित दैनिक पथ पर ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

हिन्द की हिंदी

विश्वास नहीं होता है क्यूँ आज यहाँ इंसानों पर उमड़ता नही क्यूँ प्रेम आज भारत के विद्वानों पर लिखता नही लेख क्यूँ कोई, क्या शब्द सदी संग समा गए या आचार विचार वो साथ ले गए, द्वेष भावना थमा गए क्यों नही गूंजते शब्द मैथिली आकर मेरे कानों में क्यों नही समझती आज की जनता शब्द बड़े पैमानों में वही लिखावट वही बनावट अक्षर वही प्रलोभन के निर्वाचन हो या निर्वाचित या उपकरण शब्द संबोधन के जयशंकर, मुंशी और निराला, दिनकर को याद दिलाऊँगा मै ज्योति प्रकाश हिन्द की गरिमा आज यहाँ दिखलाऊँगा अंग्रेजों पर भारी थी और भारी आज भी है हिंदी जैसे अंग्रेजी महिला पर भारी पड़ती है बिंदी कितनी महत्वपूर्ण है हिंदी आज यहाँ बतलाऊँगा मै ज्योति प्रकाश हिन्द की गरिमा आज यहाँ दिखलाऊँगा प्रेम छलकता है हिंदी का जब चरण पखारे जाते हैं मस्तक ऊँचा हो जाता है जब भविष्य सँवारे जाते हैं कालिदास की रचना का सारांश यहाँ समझाऊँगा मै ज्योति प्रकाश हिन्द की गरिमा आज यहाँ दिखलाऊँगा भार्या की डांट पड़ी जो पड़ी पड़ गयी दृष्टि माँ काली की विद्या से मिल गयी विद्योतमा झुकी नजर मद वाली की सूर हुए रवि के समान तुलसी चंद्र समान बने उडगन केशवदास हुए ...