कमरे की हर दीवारें हर कोना यह बोल रहा है
कहाँ गई वो परछाई जिसके बिन तू पागल है
जिसके पैरों के पायल से घर में छन छन होती थी
जिसके हाथों के सिहरन से आँखें दर्पन होती थी
कमरे की हर सीढ़ी हर खिड़की यह पूछ रही है
कहाँ गई वो अंगड़ाई जिसके बिन तू पागल है
जिसका उठना जिसका चलना
जिसका हँसना जिसका कहना
जिसकी बिन्दी जिसका गजरा
जिसकी लाली जिसका कजरा
जिसकी नथिया जिसका झुमका
जिसका कर्धन जिसका ठुमका
जिसकी चूड़ी जिसका कंगन
जिसकी मेहँदी जिसका चंदन
बस तुझको - बस तुझको ही देखा करते थे
तू इक बार जो कह दे तो सौ सौ बार वो मरते थे
हर पल पूछ रहे हैं मुझसे बिखरे - बिखरे सन्नाटे
कहाँ गई वो अँगनाई जिसके बिन तू पागल है
कमरे की हर दीवारें हर कोना यह बोल रहा है
कहाँ गई वो परछाई जिसके बिन तू पागल है
ज्योति प्रकाश राय
भदोही, उत्तर प्रदेश
Comments
Post a Comment