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लक्ष्य

धैर्य नहीं खोना है हमको, डिगा नहीं सकता कोई विचलित नहीं हृदय होगा तो, झुका नहीं सकता कोई आओ जाने रण कौशल में, लक्ष्य को जिसने पाया है नरेंद्र दत्त आत्मज्ञान पा कर, विवेकानंद कहलाया है पराधीन भारत को जिसने, विश्व जगत में खड़ा किया आध्यात्म दिखाकर भारत गौरव, अन्य देश से बड़ा किया लक्ष्य एक जब- जब होगा, तब-तब सब आनंद मिलेगा सम्मानित होगा जन-जन में, पुनः विवेकानंद मिलेगा लक्ष्य एक था भिलनी सबरी, राम दरश की प्यासी थी हार नहीं मानी जीवन में, दुखिया भले उदासी थी दरश दिये श्री राम गहन (वन) मे, लक्ष्य प्राप्त सबरी धायी अडिग रहो बस ध्येय बनाकर, अवश्य मिलेंगे रघुराई लक्ष्य बनाया आजाद भगत ने, हंस कर फंदे को चूम गए उसी लक्ष्य को पूरा करने, गांधी जी पैदल घूम गए लक्ष्य नेक हो नेक पथिक हो, जनसमूह आ जाएगा विचलित मन दर-दर भटकेगा, खुद ही खुद को खा जाएगा लक्ष्य बनाया जब अर्जुन ने, मत्स्य नयन को भेद गये लक्ष्य बनाया वसुदेव कृष्ण ने, अधर्म धरा से खेद गये आओ मिलकर संकल्प करें, हमें लक्ष्य को पूरा करना व्यर्थ नहीं है अपना जीवन, प्रकाश हृदय में भरना है ज्योति प्रकाश राय भदोही उत्तर प्रदेश- 221309

हौसला

 हिम्मत के बल पर हिमालय झुका है विद्या के धन पर विद्यालय टिका है हौसला नहीं टुटा था थे भीम गदाधारी कौरव हुए पराजित दुर्योधन को लात मारी उम्मीद थी संजोये शबरी के राम आए विश्वास प्रेम भक्ति में जूठे भी बेर खाए हौसला नहीं डिगा था प्रह्लाद का कभी भी विफल हुआ था कश्यप जल्लाद थे सभी भी विश्वास भर के रग में आगे बढ़ी थी रानी फिरंगी को पस्त करके पिला दिया था पानी हौसला नहीं था टूटा राणा लड़े लड़ाई खा कर के घास रोटी शत्रु पर किए चढ़ाई सेना भले ही कम थी हिम्मत की ना कमी थी शिवा क्षत्रपति थे मां भवानी की सर ज़मी थी अंधेरों को चीर कर के दिया करे उजाला हमने प्रयत्न कर के हिमालय समेट डाला हौसला रहेगा हममे हम जंग जीत लेंगे अपनों के साथ होकर हर रंग प्रीत लेंगे आओ करें हम मिलकर ज्योति संग इरादा पिछले प्रयत्न से भी होगा प्रयत्न ज्यादा ज्योति प्रकाश राय भदोही उत्तर प्रदेश 8879648743

पश्चाताप

  पश्चाताप (भाग -1) मुख्य किरदार ममता, संजीव सहायक किरदार तमन्ना, विनय, विकास, इत्यादि। ममता - संजीव तुम बैठो मैं चाय बनाकर लाती हूं। (रसोई घर से) ओ हो माफ करना संजीव अभी - अभी गैस खत्म हो गया सिर्फ पानी ही गर्म हुआ था , चलो आज हम लोग पास वाले चाय के टपरी से चाय पीते हैं वहां ताजी हवाओं का भी आनंद मिलेगा। संजीव - अभी नहीं ममता जी आप बैठिए मै बस अभी - अभी खाना खा कर आ रहा हूं। शाम को चलेंगे वहां चाय पीने और ठंडी हवाओं का लुत्फ उठाने। ममता - ठीक है अच्छा! बैठो मै तुम्हारे लिए एक पत्रिका रखी हूं उसे पढ़कर तुम्हे अच्छा लगेगा। (संजीव को पत्रिका देते हुए) पता है यह पत्रिका मेरे जीवन की अत्यंत महत्वपूर्ण पत्रिका है क्योंकि यह सौवीं (सतक) पत्रिका है जिसे देखकर मै इतना खुश हुई थी कि मानों मेरे मन को दो पल के लिए हर ग़म से आजादी मिल गई हो और मै दुनिया के हर अच्छे - बुरे कर्म को छोड़ मात्र खुशी भरे नेत्रों से ओझल और खुद में सराबोर हो रही थी। संजीव - इतना कुछ क्या है इस पत्रिका में ? जो आप बताते हुए भी इतना तनावमुक्त है और किसी विशेष पल का आनंद प्राप्त कर रही हैं। (पत्रिका पढ़ने पर) अरे वाह मम...

स्मृति शेष

 उड़ गए पखेरू छोड़ जहां को अब नहीं कोई भी अपना है बीता जीवन सुख में दुख में अब याद बची और सपना है बाजार लगा था जो कुछ भी अब बदल गया है मातम में बिलख रहे हैं जो थे अपने बस धीरज ही अब मरहम है घर से निकाल अब बाहर है पार्थिव शरीर से प्यार किसे धरती माता आकाश पिता है अब प्रेम किसे और चाह किसे बन गई कहानी मेरी बातें चर्चित हूं हर मुख मंडल पर कहते सुनते हंसते रोते मै छोड़ चला नभमंडल पर मै जिंदा हूं रीति रिवाजों में अब परंपरा में बसाना तुम करना याद मुझे तिथि पर हस कर रीति निभाना तुम ले रहा विदा मै इस जग से मत आंसू और बहाना तुम अब कसम तुम्हे है घरवालों खुशियों संग मुस्काना तुम

मणिकर्णिका घाट

 यह घाट बनारस का, स्थापित है खुद में है मोक्ष द्वार यह भी, ईश्वर हैं रज रज में कलकल है करती, अविरल  जल गंगा मुक्ति मिले सबको, मनु संग कीट पतंगा अंखियों के नीर क्यूं बहाते हैं लोग यहां पापियों को पुण्य से मिलाते हैं लोग यहां शंखों की ध्वनि से आभास हो रहा है धुआं उठा है नभ में आकाश रो रहा है ज्योति प्रज्वलित हुई मन के द्वेष मिट गए ओम शांति पाठ से ग्रह और क्लेश मिट गए नमन है शिव को भाव से नयन के लगाव से भक्ति रस में डूब कर जोगिया के रंगाव से मणिकर्णिका महान है प्रातः स्नान है वाराणसी के घाट में ज्योति दिव्यमान है ज्योति प्रकाश राय

गणतंत्र दिवस

 लिख कर आज लहू से, दिल की प्यास बुझाएंगे हिन्द देश के झण्डे को, अम्बर तक लहराएंगे आंख उठा कर ऊपर देखो, भारत आज खड़ा नभ में आत्मशक्ति से एक बना है, विश्वास जमा है रग रग में हम याद रखेंगे वीरों को, मिलकर शीश झुकाएंगे हिन्द देश के झण्डे को, अम्बर तक लहराएंगे हिन्दुस्तां परिवार हमारा, सारा सच भी हिस्सा है मिटा देंगे आतंक यहां से, जो जन्म जन्म का किस्सा है गणतंत्र दिवस के अवसर पर, मिलकर सौगंध उठाएंगे हिन्द देश के झण्डे को, अम्बर तक लहराएंगे अमर बने जो देश के खातिर, उनको तिलक लगाना है कश्मीर धारा से गद्दारों को, मिलकर आज भगाना है देश भक्ति के फूलों से, सारा सच महकाएंगे हिन्द देश के झण्डे को, अम्बर तक लहराएंगे शास्त्री बोस जवाहर गांधी, आजाद आज भी जिन्दा हैं स्वागत है श्री मान सत्य का, निंदनीय की निन्दा है भारत मां की रक्षा खातिर, मौत से भी टकराएंगे हिन्द देश के झण्डे को, अम्बर तक लहराएंगे गद्दारों के खंजर खा कर, धरा को जिसने सींचा है उन बलिदानी बेटों से, भारत का मस्तक ऊंचा है छुपे हुए गद्दारों को, हम खींच के बाहर लाएंगे हिन्द देश के झण्डे को, अम्बर तक लहराएंगे भिन्न भिन्न हैं लोग यहां पर,...

बहिष्कार

हैवान आंसुओं में सब डुबोना चाहता है तबाह करके सबको अब रोना चाहता है उसने खुद लुटाई इज्जत अपने वतन की अब ढोंगी फरियाद कर संजोना चाहता है हैवानियत की  सारी हदें  लांघ दी जिसने वो अब इंसानों में सामिल होना चाहता है बहिष्कार करना है ऐसे फरियादियों का जो ईर्ष्या के बीज भू पर बोना चाहता है बयां करता है सारा सच जिसकी सच्चाई वो कांटा अब गुलाबी पुष्प होना चाहता है दबाकर आज भी रंजिश दिल में साहिब मिलकर दरिंदा मुकम्मल होना चाहता है रास आया नहीं चमकता हिंदुस्तान जिसे वो कालिख लगा कर मुंह धोना चाहता है अब सच्चाई का सिक्का उछालेगा सारा सच क्यों चिल्लाकर बुजदिल चुप होना चाहता है गुनाहों को यकीनन माफ़ कर देता भारत पर कौन अपने परिवार को खोना चाहता है जिसने धज्जियां उड़ाई संविधान की पूरी वो दागदार अब सभी दाग धोना चाहता है बहिष्कार करना होगा बुराइयों का जड़ से जो अंधेरा कायम कर खुश होना चाहता है बेपरवाह आलम संग साजिशों की सियासत धोखेबाज छिपने को गली कोना चाहता है जिसकी जमानत भी जब्त हो गई घर में वो लालकिले का सरदार होना चाहता है कुछ लोग आए हैं उसके बीच बचाव करने उन्हें पता नहीं तख्तापलट होना चाह...

पवित्र उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश दिवस (24-01-2021) सत्य को समर्पित जहां विष्णू महेश हैं पवित्र मातृभूमि वही उत्तर प्रदेश है कण कण में बसी यहां भक्ति भाव ज्योती रज रज में मिली यहां पवित्र प्रेम मोती मिलता जहां पे आकार ज्ञान का संदेश है पवित्र मातृभूमि वही उत्तर प्रदेश है देवगण हुए लालायित जीवन मिले यहां पर तीर्थों में तीर्थ स्थल अयोध्या बसे जहां पर जन्मे श्री राम लक्ष्मण सत्रुघ्न भरत योगी जन्म हो वहां यह लालसा किसे न होगी जन्मे श्री राम यहां इसमें कुछ उद्देश्य है पवित्र मातृभूमि वही उत्तर प्रदेश है चित्रकूट धाम जहां राम का निवास बना तुलसी प्रमाण बने मन में विश्वास बना धर्म रथ से चल पड़े राम जग को तारने पापियों का अंत किए लगे जब संहारने विश्व में प्रसिद्ध जहां आदर्श का परिवेश है पवित्र मातृभूमि वही उत्तर प्रदेश है कैलाश छोड़ शिव बसे काशी मोक्ष धाम बना यहां मृत्यु मात्र से ही पापियों का काम बना शिव के दरश मात्र से मन शांति मिले सदा काशी विश्वनाथ जपो भ्रांति सब मिटे सदा तीर्थ वो जो मोक्ष करे काशी खुद महेश हैं पवित्र मातृभूमि वही उत्तर प्रदेश है ।। ज्योति प्रकाश राय ।।

सरस्वती वंदना

हे बुद्धि देवी हे ज्ञान दायिनी, हे वीणा वादिनी हे सरस्वती हे हंसवाहिनी, हे ब्रह्मा प्रिया तुमसे है मिटती चक्षु निशा, तुमसे है जलता हिय दिया निशि प्रातः करू मै वंदना, तुमको समर्पित कामिनी हे बुद्धि देवी हे ज्ञान दायिनी, हे वीणा वादिनी।। हे विद्या विद्यमाता, हे पुस्तक धारिणी तुमसे है बहती ज्ञान गंगा, तुमसे है ज्योति दिव्यमान उत्तपन्न तुमसे है मधुरता, तुमसे है यह भारत महान खण्डित ना हो भारत धरा, रक्षा करो सौदामिनी हे बुद्धि देवी हे ज्ञान दायिनी, हे वीणा वादिनी।। हे ज्ञान की सुधामुरती, हे देवी हंसासना तुमसे है उज्ज्वल भविष्य सबका तुमसे है मिथ्या हारती उत्त्पन्न तुमसे है सत्य निष्ठा तुमसे है जग मां भारती हमे सत्य पथ पर अडिग करना हे रूप सौभाग्य दायिनी हे बुद्धि देवी हे ज्ञान दायिनी, हे वीणा वादिनी।। हे शास्त्र रूपी  हे ब्रह्मजाया, हे देवी चंडिका तुमसे सुशोभित ज्योति विद्या तुमसे है जीवन साधना तन मन धन समर्पित है तुम्हें आशीष दो हे निरंजना भटके नहीं हम धर्म से विपदा हरो मां सुवासिनी हे बुद्धि देवी हे ज्ञान दायिनी, हे वीणा वादिनी।। ।। ज्योति प्रकाश राय ।। ( उज्जवल )

परिचय

परिचय सुनूं या परिचय सुनाऊं परिचय में क्या क्या यहां मै बताऊं परिचय करा दूं इंसानियत का सबसे जो सब में है रहता छिपी बात सबसे भूख से तड़पता प्यास से विकल था वृद्ध व्यक्ति ऐसा न उसके पास बल था कराहता पुकारता दया की दृष्टि कर दो हे भाग्य के विधाता नीर वृष्टि कर दो हे सूर्य हे दिवाकर करुणामयी बनो तुम किरणों को शून्य कर दो हे चंद्रमा तनो तुम क्षिण शक्ति हो चुकी है असहाय हो चुका हूं इंसानियत ख़तम है विश्वास खो चुका हूं इंसानियत बचाने विश्वास को जगाने धर्मराज चल पड़े हैं इंसानियत है सब में यह बात फिर बताने प्रभु आज चल पड़े हैं उदंड एक राही चलता गया वहां से इंसानियत का परिचय मिलता गया वहां से आंखों से वृद्ध टुक टुक देखे न मुंह से बोले राही चला था धुन में मस्ती में पांव डाले अचानक रुका फिरा वह वृद्ध पास आया क्षमा हे वृद्ध बाबा विलम्ब ज्ञान आया सहारा मै बन रहा हूं आशीष चाहता हूं इंसानियत बनी रहे हे जगदीश चाहता हूं परिचय में ज्योति कहता प्रकाश ना बुझे यह जीवित रहे मनुष्यता विश्वास है मुझे यह।। ।। ज्योति प्रकाश राय ।। (उज्जवल)

तुम

ना पास आते हो तुम ना दूर जाते हो तुम तमन्ना क्या है तुम्हारी ना ही बताते हो तुम मैंने सुना है मोहब्बत है मुझसे फिर क्यूं निगाहें बचाते हो तुम राज - ए - मोहब्बत क्या है दिल में जो देख कर इतना मुस्कुराते हो तुम गुस्ताख़ी माफ़ ऐ हुस्न - ए - हुज़ूर बड़ी शिद्दत से आजमाते हो तुम मै सरोवर सा रहता तुम्हारे जिगर में क्यूं लहरों की जिद से जगाते हो तुम मै नहीं कोई दुश्मन ना कोई परिंदा जो छुपकर छुपाकर जलाते हो तुम

स्वतंत्रता दिवस

अंग्रेजी रानी का जर्रा जर्रा थहराया था जब हिन्दुस्तानी वीर सपूतों ने विजय तिरंगा फहराया था राज गुरु सुखदेव भगत सिंह आज भी गाये जाते हैं चंद्रशेखर आजाद उधम सिंह हर मुख पर दोहराए जाते हैं अंग्रेजी तोप चलाने वाला लाठी से घबराया था जब हिन्दुस्तानी वीर सपूतों ने विजय तिरंगा फहराया था यह भारत मंगल पांडे का है जिसने पहली बंदूक चलाई थी लंदन की अंग्रेजी इज्जत मिट्टी में स्वयं मिलाई थी रानी लक्ष्मी का युद्ध देख डलहौजी शीश झुकाया था तब भारत के वीर सपूतों ने विजय तिरंगा फहराया था स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हम सब को हाथ बढ़ाना है विजई विश्व तिरंगा को अंबर तक ले जाना है इस पर आंच न आने पाए आतंकी दिया बुझाना है विजई विश्व तिरंगा को अंबर तक ले जाना है ।। ज्योति प्रकाश राय ।।

बसंती हवा

ऐ बसंती हवा रुक तो जरा कुछ कहना है तुझसे सुन तो जरा ये सरहद है मेरे देश मेरे वतन की मै इसका सिपाही कसम है कफ़न कि ये बंदूक ये गोली, और खून की होली सब क़यामत है, गुन तो जरा ऐ बसंती हवा कुछ कहना है तुझसे सुन तो जरा तू वाकिब है मेरे, रहन और सहन से ये जख्म के निशा, और चोटिल बदन से ये हांथ पर निशा पहली जंग का है ये आंखों का पानी लहू रंग का है ये निशा ये रंग, कुछ चुन तो जरा ऐ बसंती हवा कुछ कहना है तुझसे सुन तो जरा मेरे गांव में रहते मेरे यार हैं मेरे बचपन के साथी बड़े दिलदार हैं मेरा घर मेरी मां है वहीं उनसे मिलने के सपने बुन तो जरा ऐ बसंती हवा कुछ कहना है तुझसे सुन तो जरा मै बेटा हूं उसका काम वतन के आना है मै खून हूं उसका सरहद से मिल जाना है गर्व करना मुझपर मेरे यारों जब मिट्टी में मिल जाऊंगा मै यार हूं तुम्हारा काम वतन के आऊंगा ।। ज्योति प्रकाश राय ।।

दूरदर्शन

अपने बचपन का दिन राफेल विमान था कार्यक्रम में सूपर शक्ति शक्तिमान था भक्ति सागर में डूबा भक्ति मय इंसान था कार्यक्रम में सूपर शक्ति शक्तिमान था रंगोली के गाने बड़े मजेदार थे चित्रहार के बहाने मिलते सब यार थे कृष्णा महाभारत रामायण महान था कार्यक्रम में सूपर शक्ति शक्तिमान था संजोग और एहसास कहानी घर घर की क़यामत से घिरी जिंदगी कश्मकश की आंखों देखी समाचार का सम्मान था कार्यक्रम में सूपर शक्ति शक्तिमान था सत्यम शिवम् सुंदरम दूरदर्शन था प्यारा हिन्दी फीचर फिल्म मनोरंजन था हमारा हर समस्या का बस दूरदर्शन समाधान था कार्यक्रम में सूपर शक्ति शक्तिमान था ।। ज्योति प्रकाश राय ।।

ख़त

कभी वो सुबह लिखते हैं कभी वो शाम लिखते हैं। मै जब भी उन्हें याद करता हूं वो ख़त मेरे नाम लिखते  हैं।। मै जब भी उदास होता हूं तन्हाइयां मुझे सताती हैं वो अपनी मोहब्बत में खुशी का पैग़ाम लिखते हैं मै जब भी उन्हें याद करता हूं। वो ख़त मेरे नाम लिखते हैं।। हर शख्स दीवार उठाने आता है मेरे और उनके मोहब्बत के दरमियान वो हर दीवार गिराने का अंज़ाम लिखते हैं मै जब भी उन्हें याद करता हूं। वो ख़त मेरे नाम लिखते हैं।। तारीफ में उनकी मै क्या क्या कहूं बस इतना ही जान लेना खयाल उनका वो दिल से नमस्ते कलम से सलाम लिखते हैं मै जब भी उन्हें याद करता हूं। वो ख़त मेरे नाम लिखते हैं।।

लद्दाख

ये हिन्दुस्तान है, जीने का आसार बता देगा मित्रता में अनुभव, अधिकार बता देगा इसे तोड़ने की कोशिश भी मत करना दुनिया के नक्शे से, आकार मिटा देगा लद्दाख नहीं है साझे की, ना ही किसी का हिस्सा है हर व्यक्ति पड़ोसी हक चाहे, यह जन्म जन्म का किस्सा है यदि आंख उठाएगा कोई, उसके अहंकार मिटा देगा ये हिन्दुस्तान है, नक्शे से आकार मिटा देगा जोरदार का झटका, पाक अभी जो झेला है ये शत्रुओं से प्यार है, जो भारत ने खेला है इस बार मिला जो चीन अकड़ कर उसको मिलने का संस्कार बता देगा ये हिन्दुस्तान है, नक्शे से आकार मिटा देगा ।। ज्योति प्रकाश राय ।।

हिन्दुस्तान की मिट्टी

ये हिन्दुस्तान की मिट्टी है, मां के नाम से जानी जाती है इसको छू कर वीर सपूतों की, धड़कन पहचानी जाती है धरती को मां संबोधित कर, गर्व कराता है भारत चिकनी दोमट बलुई काली, पर्व मनाता है भारत इस पर आंच न आने पाए, बंदूकें तानी जाती हैं ये हिन्दुस्तान की मिट्टी है, मां के नाम से जानी जाती है गीता कुरान गुरुग्रंथ बाइबिल,सब कुछ भारत अपनाया है जब जब दुश्मन खड़ा हुआ, मिट्टी में उसे मिलाया है सरहद पर महके जो खुशबू, वीरों से पहचानी जाती है ये हिन्दुस्तान की मिट्टी है, मां के नाम से जानी जाती है

मौत

एक रात मेरी मौत से मुलाकात हो गई हाल पूछा, फिर थोड़ी सी बात हो गई उलझन में थी, कोई घर ढूंढ रही थी वो मै ही था, जिसे नजर ढूंढ रही थी कहने लगी, तुम बहुत सता रहे हो क़यामत खड़ी है, फिर भी मुस्कुरा रहे हो आज तुम्हे जिंदगी से दूर जाना है जिंदगी को छोड़ मौत अपनाना है ये आलम, ये हस्ती, ये जीवन, ये मस्ती तुझपर सब कुछ वार दूंगा चल मेरे घर, तुझे एक उपहार दूंगा लाल जोड़े में तेरा दीदार करना है तू मेरी है, तुझे प्यार करना है कह गई है आऊंगी, आज जाने दो मेरा इंतजार करो, खुद को मुस्कुराने दो अब तक मै उसका इंतजार कर रहा हूं मौत ना सही, जिंदगी से प्यार कर रहा हूं ।। ज्योति प्रकाश राय ।।

विरह

ऐ घनघोर घटा के काले बादल क्या तुम मेरा संदेशा ले जा सकते हो ? मेरे विरह, मेरे तड़प का, एक दर्द उन्हें बतला सकते हो ऐ घनघोर घटा के काले बादल क्या तुम मेरा संदेशा ले जा सकते हो ? यूं रिमझिम रिमझिम जल बरसाना जैसे आंखे बहती हैं उन्हें भिगा कर समझाना यादें उनमें रहती हैं यादों में कितनी व्याकुलता है क्या व्याकुलता दिखला सकते हो ? मेरे विरह, मेरे तड़प का, एक दर्द उन्हें बतला सकते हो ऐ घनघोर घटा के काले बादल क्या तुम मेरा संदेशा ले जा सकते हो ? उनको अपनी चमक दिखाना मेरी परछाई दर्शाना विरह जलन क्या होती है तपिश भूमि सा जल जाना मेरी अगन, मेरी तपिश का, क्या शोला भड़का सकते हो मेरे विरह, मेरे तड़प का, एक दर्द उन्हें बतला सकते हो ऐ घनघोर घटा के काले बादल क्या तुम मेरा संदेशा ले जा सकते हो ?

बहन

सौगात उसके प्यार का, हर उपहार से बढ़कर है उसका सम्मान और अधिकार, हर अधिकार से बढ़कर है उसकी हसी में इतनी मोहब्बत है कि उसकी हसी हर दिलदार से बढ़कर है मै दुनिया की हर खुशी उस पर वार दूंगा मै जीवन के अंत तक उसे प्यार दूंगा लाख संघर्ष हो मेरे जीवन में कुछ गम नहीं उसकी किस्मत उसका भविष्य संवार दूंगा एक बंधन ही नहीं वो दोस्त से बढ़कर है उसका हक उसकी राखी से बढ़कर है एक बहन ही तो है बचपन का प्यार मेरी बहन का किरदार हर किरदार से बढ़कर है ।। ज्योति प्रकाश राय

विश्वासघात

मानवता एक बार फिर शर्मसार हुई है और इसका जिम्मेदार भी मानव प्राणी ही हुआ है वह मानव जो संसार में सबसे अधिक बुद्धिमान माना जाता है। जिसके उपयोग के लिए ईश्वर ने सुंदरता की रचना की तो सबसे पहले प्रकृति को रचा, सुंदर और आकर्षक और शीतलता से परिपूर्ण प्रकृति की विशेषता और गुणवत्ता को जानने और उसका सदुपयोग करने के लिए ईश्वर ने मनुष्य को बनाया। मनुष्य ही एक मात्र वह प्राणी है जिस पर सभी जीव-जंतु पशु-पक्षी जीवन को लेकर आश्रित रहते हैं। ऐसे में यदि मनुष्य इनका साथ छोड़ भी देता है तो ये पशु-पक्षी अपना भोजन स्वयं ही ढूंढ लेने में सक्षम होते हैं। परन्तु जब मनुष्य अपने विचारों का दुरुपयोग करता है और खुद को महान दर्शाने की इच्छा से प्रकृति को अपने अनुसार मोड़ता है और ईश्वरीय सौंदर्यता को नष्ट कर अपनी कलाओं का प्रदर्शन करता है उसी क्षण मनुष्य पतन की राह पर आ खड़ा होता है। अपने सुख सुविधा के लिए प्राणी क्या से क्या कर सकता है यह कल्पना कर पाना बहुत ही मुश्किल है। किन्तु जब मनुष्य का लालच इतना अधिक बढ़ जाए कि वह निर्दोष प्राणी का जान लेना भी सूक्ष्म समझने लगे तब मानवता शर्मसार हो जाती है। जब मनुष्य बि...

भाग्य

हर व्यक्ति के भाग्य में, कुछ ना कुछ होना लिखा है । कर्मवीर बन, कर्म कर, होने दे जो होना लिखा है ।। भाग्य था जीवित रहे, प्रहलाद कब चिंतन किये । हरि चेष्टा हर भाग्य पर, हरि स्वयं मंथन किये ।। भाग्य था ध्रुव भक्त का, हरि गोद में जीवन खिला । जगमग करे आकाश में, लाखों में ध्रुव तारा मिला ।। भाग्य था माता अहिल्या, श्री राम से मुक्ति मिली । भाग्य था जंगल बसी, सवरी को भी भक्ति मिली ।। क्यूं व्यर्थ चिंता तू करे, भाग्य में क्या कैसा लिखा । परे हो जो मनु बुद्धि से, तू कर्म कुछ ऐसा दिखा ।। कर्म ही प्रधान, कर्म ही महान, कर्म ही है ज्योति तेरा । कर्महीनता त्याग, तू  जवान, छाया नहीं पथ अंधेरा ।। संघर्ष कुछ परिपूर्ण कर, मत सोच अब रोना लिखा है । अडिग,अथक प्रयास कर,सफल भाग्य होना लिखा है ।। हार मत स्वीकार कर, हार ना होना लिखा है । कर्मवीर बन,कर्म कर, होने दे जो होना लिखा है ।। ।। ज्योति प्रकाश राय ।।

विवाद

बात चाहे जो भी हो बहस उसे विवाद तक लाकर खड़ा कर देती है। और विवाद का परिणाम हमेशा बुरा ही साबित हुआ है, विवाद अपनों को ही निगल जाने का या अपनों से दूर करने का बहुत बड़ा और गलत रास्ता है जिस पर खड़ा व्यक्ति कभी सही लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता है। यही हुआ उस दिन जोखू और जग्गी दो सगे भाईयों के बीच जोखू - (पत्नी कमला से कहते हुये) यही जग्गिया की शादी बीत जाये किसी तरह फिर को कुछ उधार बाढ़ी रहेगा सबका चुकता कर शान्ती से जीवन बिताना है। कमला - हा सब कुछ तुम्हीं को करना है, और करोगे क्यूं नहीं, जिम्मेदारी जो ओढ़ लिए हो सर पर, मै मानती हूं बड़े हो करना तुम्हारा फर्ज है लेकिन जग्गी को भी  तो समझना चाहिये न की उसका अब जिम्मेदारियों के प्रति आपका साथ चाहिये। जग्गी दोस्तों के साथ बात करते हुए आ ही रहा था कि गांव में झगड़े की आवाज सुन दौड़ पड़ा। वापस आने के बाद जोखू ने कहा तुझे कुछ अपने घर की भी चिंता फिकर है कि नहीं। दिन भर आवारागर्दी ही करता है, कल रिश्ता आने वाला है मै क्या कहूंगा किसी को कि मेरा जग्गी दोस्तों के साथ दिन भर घूमता है। जग्गी - आवारागर्दी मत कहो जोखू भइया मै और मेरे मित्र ...

मजदूर व्यापार

  मुझमें भी उत्साह भर गया जोश देख मजदूरों में सूंघे महक पसीनो की किस्मत है मगरुरों में हमने वह खड़ी इमारत की जिसमे वो आज सुरक्षित हैं हमने ही उसके छत ढाले और हम ही उससे वंचित हैं हम श्रमिक हुए मजदूर हुए इसमें क्या गलती मेरी थी तू मालिक हुआ मुनाफे का फिर भी क्यों जलती तेरी थी जो रखे तिजोरी में पैसे उसमे कुछ हिस्सा अपना है हरदम श्रमिकों का हनन हुआ अधिकार मिले यह सपना है गली बंद बाजार बंद है बंद जगत संसार है मानवता की कर रहे तस्करी मजदूर बना व्यापार है खच्चर की तरह भरे श्रमिक से पैसे लेकर व्यापार किए ऐसे दुखदाई कलिकाल में मजदूरों पर अत्याचार किए मर गए बिना घर पहुंचे जो क्या सेठ किराया भर देगा भ्रष्टाचारी फौज परिवहन क्या जीवन वापस कर देगा कुचले रौंदे मजदूर गए हर बार हनन गरीबों का रणनीति लगाने घर बैठे दिन रात मनन तरकीबों का हर बार पिसे हैं दीन दुखी उनका ही छिना निवाला है हे ईश्वर साक्षी बन न्याय करो जब ज्योति जले तो उजाला है ।। ज्योति प्रकाश राय ।।

खुशनुमा जमाना

आज एक फसाना बयां कर दूं पुरानी बातों को फिर से नया कर दूं उन दोस्तों के साथ, वक्त बिताना याद आया एक दूसरे को यूं ही, ठोकर लगाना याद आया वो आम का पेड़, वो पत्थरों का ढेर किसी गुच्छे पर, जम कर निशाना लगाना लगे तो शाबाशी, नहीं तो पीछे हट जाना वो गिल्ली डंडे की बहार, ना तीज ना त्योहार फिर भी मजे करना, सबका मजाक उड़ाना हर कोई हंसमुख था, और खुशनुमा जमाना हर शाम आइस पाइस, होती थी कौन कितना है तेज, आजमाइश होती थी चांदनी रात के उजाले में हम दिखा करते थे एक लालटेन चौतरफा दोस्त, किताब लिखा करते थे साथ जाना साथ आना, वो स्कूल का जमाना आठ आने का चूरन, सब मिलकर खाना हर कोई हंसमुख था, और खुशनुमा जमाना ऐ वक्त फिर मिला दे, उन्हीं बचपन के यारों से जरूरतों में जिंदगी लटकी है, कहीं चारदीवारों से ऐ दोस्तों जोड़ दो अपना नाम, ज्योति के सितारों से मैं आ रहा हूं गांव, यारों तुम भी चले आना कुछ कह रहा पांव, यारों सच सच बताना लौट आएगा क्या, बीता बचपन पुराना जब, हर कोई खुश था, और खुशनुमा जमाना ।। ज्योति प्रकाश राय ।।

मै तुम्हारा हूं

अपने दिल में, मेरे प्यार का अहसास रखना सारी कायनात एक तरफ, मैं तुम्हारा हूं, बस इतना विश्वास रखना ये वादियां, ये घटायें, ये मौसम, ये हवायें सब कुछ मैं छोड़ दूंगा, बस मेरा दिल अपने पास रखना मैं तुम्हारा हूं, बस इतना विश्वास रखना ये चांदनी रात , सितारों की चमक ये ठंडी हवायें , फूलों की महक बारिश की बूंदे , सहलाये बदन को जलता बदन , बढ़ाये अगन को क़यामत से लड़ने का, अभिलाष रखना मैं तुम्हारा हूं , बस इतना विश्वास रखना मैं तुम्हारा हूं , बस इतना विश्वास रखना ।। ज्योति प्रकाश राय ।।

अनकहा वक्त

एक रोज तुमने कहा था मुझसे कुछ कहूं तो समझना तो क्या समझना, समझना है तो वो समझो जो अनकहा वक़्त कहे। पढ़ना जानते हो तो इन अनकही आखों को पढ़ लो, महसूस करो अनछुआ लम्हा जो धमनियों में रक्त बहे।। अनसुना कुछ भी ना रहा तेरा अनकहा कुछ भी ना रहा मेरा शराफत की चादर कब तक लपेटेंगे हम जब लम्हों ने कर दिया तेरा - मेरा जब हम अपने पन में जीते थे, एक दूजे की निगाहों से पीते थे। नाश मुक्त होकर भी नशीले थे हम, सच में - तब बड़े रंगीले थे हम। क्यूं कसक अब भी कुछ कहने की है? अभी और कुछ अनकहे रहने की है। अनसुनी बातों पर विश्वास मत करना, शायद आदत अब भी उसी मझधार में बहने की है। ।। ज्योति प्रकाश राय ।।

भारत माता की जय बोल

रटते- रटते विश्वास बढ़ा है,भारत माता की जय बोल बढ़ते बढ़ते आकाश चढ़ा है,भारत माता की जय बोल सत्य अहिंसा के पथ से, सीख मिली है भक्ती की इंकलाब के नारों से, पहचान मिली है शक्ती की जानों अपने देश की गाथा, आजादी के नारों को प्रतिशोध लक्ष्य में उधम सिंह, गोली मारी हत्यारों को इंसाफ मिला शहीद कुआं को, भारत माता की जय बोल मिट गया आज था धुआं धुआं, भारत माता की जय बोल गुलाम देश आजाद कराने, बच्चा - बच्चा टकराया था सुखदेव,गुरु,आस्फाक़,भगत ने,अपना परचम लहराया था देश की नारी शक्ति को, अंग्रेजो ने शीश झुकाया था रानी लक्ष्मीबाई ने, तलवार स्वयं लहराया था अमर वीरांगना नारी है, भारत माता की जय बोल झांसी की गरिमा भारी है, भारत माता की जय बोल देशभक्ति के कर्तव्यों को, सीखो और सिखाना तुम घर में नौनिहाल बच्चों को, आजादी की बात बताना तुम शास्त्री,तिलक,जवाहर,गांधी, लड़े सत्य की गंगा पर मंगल,आजाद, बोस मिट गए, लहरें जो इसी तिरंगा पर आओ मिलकर सम्मान करें, भारत माता की जय बोल हम देशभक्ति गुणगान करें, भारत माता की जय बोल ।। ज्योति प्रकाश राय ।।

जीवन कर्ज

कोई जब मुझको सताता है मां की याद आती है। सेठ जब गुस्सा दिखता है मां की याद आती है।। मै जब तन्हा रहता हूं मां की याद आती है। मै जब गुन्हा करता हूं मां की याद आती है।। ये शहर कैसा है, जो सबको भूल बैठा है। टहनियां तोड़ कर अपनी, किनारे फूल बैठा है।। मै जब फूल उठाता हूं मां की याद आती है।। मै जब मुस्कुराता हूं मां की याद आती है।। यहां जब शाम होती है मां की याद आती है।। बिजलियां जब आम होती है मां की याद आती है।। ये शहर कैसा है, की रिश्तों से आगे पैसा है मेरा गांव ही प्यारा है, जहां प्रेम ही पैसा है जब लोग अपने मिलते हैं तो जैसे गांव मिलता है।। जब बिछड़े यार मिलते हैं तो जैसे छांव मिलता है।। कोई जब कहानी सुनाता है मां की याद आती है।। कोई जब गीत गाता है मां की याद आती है।। ये कैसी लगन है कि शहर आना पड़ा है ये कैसी घुटन है कि जहर खाना पड़ा है।। मै शहर से मुंह मोड़ लूंगा इसने छुड़ाया मेरा गांव मै इसे छोड़ दूंगा।। मै तेरे साथ रहूंगा मां तेरा सहारा बन कर तू नदी है मेरे जीवन की मै तुझसे जुड़ा हूं किनारा बनकर मै ज्योति हूं त...