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खुशनुमा जमाना

आज एक फसाना बयां कर दूं
पुरानी बातों को फिर से नया कर दूं
उन दोस्तों के साथ, वक्त बिताना याद आया
एक दूसरे को यूं ही, ठोकर लगाना याद आया

वो आम का पेड़, वो पत्थरों का ढेर
किसी गुच्छे पर, जम कर निशाना लगाना
लगे तो शाबाशी, नहीं तो पीछे हट जाना

वो गिल्ली डंडे की बहार, ना तीज ना त्योहार
फिर भी मजे करना, सबका मजाक उड़ाना
हर कोई हंसमुख था, और खुशनुमा जमाना

हर शाम आइस पाइस, होती थी
कौन कितना है तेज, आजमाइश होती थी

चांदनी रात के उजाले में हम दिखा करते थे
एक लालटेन चौतरफा दोस्त, किताब लिखा करते थे

साथ जाना साथ आना, वो स्कूल का जमाना
आठ आने का चूरन, सब मिलकर खाना
हर कोई हंसमुख था, और खुशनुमा जमाना

ऐ वक्त फिर मिला दे, उन्हीं बचपन के यारों से
जरूरतों में जिंदगी लटकी है, कहीं चारदीवारों से
ऐ दोस्तों जोड़ दो अपना नाम, ज्योति के सितारों से

मैं आ रहा हूं गांव, यारों तुम भी चले आना
कुछ कह रहा पांव, यारों सच सच बताना
लौट आएगा क्या, बीता बचपन पुराना
जब, हर कोई खुश था, और खुशनुमा जमाना

।। ज्योति प्रकाश राय ।।

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