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अनकहा वक्त

एक रोज तुमने कहा था मुझसे
कुछ कहूं तो समझना तो क्या समझना,
समझना है तो वो समझो जो अनकहा वक़्त कहे।
पढ़ना जानते हो तो इन अनकही आखों को पढ़ लो,
महसूस करो अनछुआ लम्हा जो धमनियों में रक्त बहे।।

अनसुना कुछ भी ना रहा तेरा
अनकहा कुछ भी ना रहा मेरा
शराफत की चादर कब तक लपेटेंगे हम
जब लम्हों ने कर दिया तेरा - मेरा

जब हम अपने पन में जीते थे,
एक दूजे की निगाहों से पीते थे।
नाश मुक्त होकर भी नशीले थे हम,
सच में - तब बड़े रंगीले थे हम।

क्यूं कसक अब भी कुछ कहने की है?
अभी और कुछ अनकहे रहने की है।
अनसुनी बातों पर विश्वास मत करना,
शायद आदत अब भी उसी मझधार में बहने की है।

।। ज्योति प्रकाश राय ।।

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