देखा है जो भी आँखों से, और सुना है मैने कानों से मै व्यक्त करूँ बोलो कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है है जंग बड़ा भीषण खुद से, उसमें अपने प्रतिद्वंदी हैं मै नाम लिखूँ बोलो कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है बादल की तेज भड़क से भी, होता है असर मनुष्यों पर यह पृथ्वी मुह खोले कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है नदियाँ मिलती हैं सागर से, उनका भी वेग बदलता है बोलो सागर बोले कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है सूरज की तेज तपिश से, सारा जग त्राहि त्राहि करता कहो चंद्रमा बोले कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है निर्बल असहाय निरंतर ही, झुकते झुकते गिर जाते हैं अब साथ नही देता कोई, हैं मौन अधर कुछ कारण है है स्वार्थ भरा सबका जीवन, अब नही रहा हमदर्द कोई जख्म दिखाना पागलपन, हैं मौन अधर कुछ कारण है सत्य मार्ग है बड़ा कठिन, इस पर चलना जब मोह न हो लोभ मोह घटता ही नही, हैं मौन अधर कुछ कारण है जब ज्योति जले जग रौशन हो, अन्धकार मिट जाएगा मन का तम मिटता ही नही, हैं मौन अधर कुछ कारण है ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश
मेरी कविता और कहानी और अन्य रचनाओं का एक संग्रह है, यह मेरी उपलब्धियों को मेरे साथ बनाये रखने में मेरी मदद करता है। मेरा ब्लॉग भी मेरी पहचान का एक साधन है। ज्योति प्रकाश राय I have a collection of poetry and story and other compositions, it helps me keep my achievements with me. My blog is also a tool for my identity. Jyoti Prakash Rai