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Showing posts from December, 2024

कुछ कारण है

देखा है जो भी आँखों से, और सुना है मैने कानों से मै व्यक्त करूँ बोलो कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है है जंग बड़ा भीषण खुद से, उसमें अपने प्रतिद्वंदी हैं मै नाम लिखूँ बोलो कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है बादल की तेज भड़क से भी, होता है असर मनुष्यों पर यह पृथ्वी मुह खोले कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है नदियाँ मिलती हैं सागर से, उनका भी वेग बदलता है बोलो सागर बोले कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है सूरज की तेज तपिश से, सारा जग त्राहि त्राहि करता कहो चंद्रमा बोले कैसे, हैं मौन अधर कुछ कारण है निर्बल असहाय निरंतर ही, झुकते झुकते गिर जाते हैं अब साथ नही देता कोई, हैं मौन अधर कुछ कारण है है स्वार्थ भरा सबका जीवन, अब नही रहा हमदर्द कोई जख्म दिखाना पागलपन, हैं मौन अधर कुछ कारण है सत्य मार्ग है बड़ा कठिन, इस पर चलना जब मोह न हो लोभ मोह घटता ही नही, हैं मौन अधर कुछ कारण है जब ज्योति जले जग रौशन हो, अन्धकार मिट जाएगा मन का तम मिटता ही नही, हैं मौन अधर कुछ कारण है ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

क्या जीता और क्या हारा

जब निम्न स्तर पर स्वर्ग लगे और शून्य लगे यह जग सारा तब समझो दिल का रोग लगा अब क्या जीता और क्या हारा अब वही दर्द और वही दवा और वही वैद्य बनकर डोले जग कुछ बोले मै कुछ बोलूँ मन कुछ बोले वो कुछ बोले हूँ नही किसी का साथी अब और नही रहा जब बेचारा तब समझो दिल का रोग लगा अब क्या जीता और क्या हारा क्यूँ कभी कभी यह लगता है यह गगन उसी का हिस्सा है मै उसका जीवन किस्सा हूँ वो मेरा जीवन किस्सा है जब उसने अपना दिल सौंपा मै भी जब उस पर दिल वारा तब समझो दिल का रोग लगा अब क्या जीता और क्या हारा ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश

तुम होते

 बस यही सोच कर,  दिन गुजर जाता है शाम ढल जाती है कि, तुम होते तो ये उदासी नही होती बस यही सोच कर,  मोड़ छूट जाते हैं राह खत्म हो जाती है कि, तुम होते तो ये खामोशी नही होती बस यही सोच कर,  नींद मिट जाती है रात कट जाती है कि, तुम होते तो ये तन्हाई नही होती बस यही सोच कर,  मन भर आता है आँख भर जाती है कि, तुम होते तो ये जुदाई नही होती

पागलपन

कमरे की हर दीवारें हर कोना यह बोल रहा है कहाँ गई वो परछाई जिसके बिन तू पागल है जिसके पैरों के पायल से घर में छन छन होती थी जिसके हाथों के सिहरन से आँखें दर्पन होती थी कमरे की हर सीढ़ी हर खिड़की यह पूछ रही है कहाँ गई वो अंगड़ाई जिसके बिन तू पागल है जिसका उठना जिसका चलना जिसका हँसना जिसका कहना जिसकी बिन्दी जिसका गजरा जिसकी लाली जिसका कजरा जिसकी नथिया जिसका झुमका जिसका कर्धन जिसका ठुमका जिसकी चूड़ी जिसका कंगन जिसकी मेहँदी जिसका चंदन बस तुझको - बस तुझको ही देखा करते थे तू इक बार जो कह दे तो सौ सौ बार वो मरते थे हर पल पूछ रहे हैं मुझसे बिखरे - बिखरे सन्नाटे कहाँ गई वो अँगनाई जिसके बिन तू पागल है कमरे की हर दीवारें हर कोना यह बोल रहा है कहाँ गई वो परछाई जिसके बिन तू पागल है ज्योति प्रकाश राय भदोही, उत्तर प्रदेश