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शायरी संग्रह

अन्तिम
उठ रही जो भावना, कोमल हृदय के आत में
हे प्रिये समझो इसे, अब ना मिलो तुम रात में
अन्तिम करो अपना मिलन, मिलना कभी जब दिन रहे
क्यूं कौंधता है मन हमारा, ऐसी व्यथा किससे कहे

तुम भी तो उस पल जल रही थी, बिन अग्नि वाले आग में
उठ रही कुछ भावना, कोमल ह्रदय के भाग में
अच्छा हुआ अन्तिम हुआ, जो कुछ हुआ अनुराग में
अब जब जलेंगे संग जलेंगे, प्रेम वाले आग में

अनकहा
एक रोज तुमने कहा था मुझसे

कुछ कहूं तो समझना तो क्या समझना,
समझना है तो वो समझो जो अनकहा वक़्त कहे।
पढ़ना जानते हो तो इन अनकही आखों को पढ़ लो,
महसूस करो अनछुआ लम्हा जो धमनियों में रक्त बहे।।

अनसुना कुछ भी ना रहा तेरा
अनकहा कुछ भी ना रहा मेरा
शराफत की चादर कब तक लपेटेंगे हम
जब लम्हों ने कर दिया तेरा - मेरा

जब हम अपने पन में जीते थे,
एक दूजे की निगाहों से पीते थे।
नाश मुक्त होकर भी नशीले थे हम,
सच में - तब बड़े रंगीले थे हम।

क्यूं कसक अब भी कुछ कहने की है?
अभी और कुछ अनकहे रहने की है।
अनसुनी बातों पर विश्वास मत करना,
शायद आदत अब भी उसी मझधार में बहने की है।

सजावटी

ठंडी हवाओं में भीनी भीनी खुशबू
पूरे बदन को महका रही हैं
क्या तुमने इनसे अपना हाल भेजा है
जो मुझमें ये सिमटती जा रही हैं

ये रातों के रंगीन सजावटी तारें
तुम्हारेे मुस्कुराने से टिमटिमा रहे हैं
क्या तुमने कोई ख्वाब भेजा है
जो मेरी आंखों में जगमगा रहे हैं

ये अंधेरी रात हर तरफ सन्नाटा
किसी आहट का इशारा बता रही है
क्या ख्वाबों में खुद तुम आ रहे हो
जो मुझे तुम्हारा एहसास करा रही है


।। ज्योति प्रकाश राय ।।

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