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आदमी

 एक होकर भी कई भाग में बट गया है आदमी

जिम्मेदारियों के बोझ तले पट गया है आदमी


मिलते ही नहीं अब निशाँ सड़कों पे आजकल

इस तरह मजबूरियों में सिमट गया है आदमी


किसके है साथ किसके नहीं किसका है क्या पता

सभी के लिए टुकड़ों में यार कट गया है आदमी


हर तरफ हर जगह है शोर चोर चोर चोर चोर चोर

गफलतों मे गलतियाँ न हो फिर हट गया है आदमी


किसको सुनाये दास्तां अपने दिलों के आरजू

अब हर नज़र हर जिगर से फट गया है आदमी


हर हाल में हर चाल में हर ढाल में ढलता गया

पीछे नही हरगिज मुड़ा जब डट गया है आदमी


ज्योति प्रकाश राय

भदोही उत्तर प्रदेश

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